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नवाज शरीफ नोबेल पुरस्कार कार्यक्रम में शिरकत नहीं करेंगे भारतीय-अमेरिकी के नाम पर अमेरिका में बिजनेस स्कूल भारतीय-अमेरिकी प्रोफेसर थॉमस कैलथ को नेशनल मेडल ऑफ साइंस मोदी और ओबामा ने ऑप एड पेज पर लिखा संयुक्त आलेख नरेंद्र मोदी और ओबामा की वार्ता से नई उम्मीदें: विशेषज्ञ

Posts Tagged ‘नई हिन्दी कविता’


डॉ. प्रीत अरोड़ा की कविता ‘कशमकश’

Thursday, March 29th, 2012
डॉ. प्रीत अरोड़ा की कविता ‘कशमकश’ कशमकश जीवन एक सतत् प्रयास है, जिसमें हर क्षण एक मधुर एहसास है। इसी एहसास से फिर हम आगे बढ़ते हैं अतः संघर्ष व प्रतियोगिता में पड़ते हैं। ऐसे भाव लेकर फिर, धर्म ,पैसे व रिश्तों के नाम पर क्यों लड़ते हैं? रिश्तों की इस लड़ाई में अब बदल चुकी है, "अपनी  परिभाषा " पुनः मधुर एवं प्रेम भाव ...

प्रवासी साहित्यकार डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव की अप्रतिम रचनाएँ

Wednesday, March 28th, 2012
प्रवासी साहित्यकार डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव की अप्रतिम रचनाएँ चेरिगंक्रास रात आधी सो रहे कुछ लोग पुल के पास दूर कुछ रंगीन चेहरे मांगते सहवास, गाडि़यों और मनुष्यों की झेलकर रफ्तार ऊँघता लन्दन शहर का व्यस्त चेरिगंक्रास *** यहां से जो कुछ गया झकझोर कर ही गया, बाढ़ आई और जल  पथ मोड़ कर ही गया नए थे अनुभव मगर क्षण में पुराने हुए और हर क्षण कुछ मुझे निचोड़ कर ही गया *** रातों का महावृक्ष वहाँ खड़ा रहा और धूप उतर गई... एक डाल और कटी भाव लगा ट्रक ...

आकर्षणः डॉ. वेद व्यथित

Friday, March 16th, 2012
आकर्षणः डॉ. वेद व्यथित आकर्षण काजल की रेख कहीं अंदर तक पैठ  गई तमस की आकृतियाँ अंतर की सुरत हुईं मन को झकझोर दिया गहरी सी सांसों ने || दूर कहाँ रह पाया आकर्षण विद्युत सा अंग अंग संग रहा तमस बहु रंग हुआ गहरे तक डूब गया अपनी ही साँसों में || चाहा तो दूर रहूँ शक्त नही मन था कोमल थे तार बहुत टूटन का डर था सोचा संगीत ...

परछाइयां: नरेश भारतीय

Thursday, March 15th, 2012
परछाइयां: नरेश भारतीय परछाइयां कल के सच की परछाइयां आज के झूठ को जब सच मानने से इन्कार करतीं हैं तो बीते कल की अनुभूतियां जीवंत हो उठती हैं जीवन सत्य को जो रचती रहीं – मैं नहीं जानता आज के जीवन सत्य कितनी गहराइयों में पैठ कर घोषित किए गए हैं और यह भी कि क्या वे सत्य ही हैं ! क्योंकि – गिर रहे हैं ...

समीक्षाः डॉ. ज़ेबा रशीद (औपन्यासिक नारी जीवन की विवेचना करती कविता)

Tuesday, March 13th, 2012
समीक्षाः डॉ. ज़ेबा रशीद (औपन्यासिक नारी जीवन की विवेचना करती कविता) समीक्षा तेरे लिखे की समीक्षा लिखूं सोच रही हूं मैं ! जिन्दगी का विशालकाय ग्रंथ गर्म-ठंडी बयार और फड़फड़ाती ऋतुओं से है जिसमें असंख्य पन्ने, और परबस हूं मैं जिनकी समीक्षा मेरे बस में नहीं है ! जब मैं सम्पूर्ण पृष्ट पढ़ लूंगी मेरे जीवन ग्रंथ की तब लिखूंगी समीक्षा मैं ! कथ्य और शिल्प में कोई योग नहीं यह क्या रचा है तूने तेरे रचे में बहुत सी ...

गांधारियों से प्रश्न – अनिलप्रभा कुमार

Monday, March 12th, 2012
गांधारियों से प्रश्न - अनिलप्रभा कुमार वह तो अन्धे थे ही तुमने क्यों पट्टी बांध ली ख़ुद अपनी आंखों पर? रोशनी थी तुम्हारे पास फिर क्यों भागीदार बनीं जीवन के अन्धेपन की? क्यों साथ दिया घटाटोप अन्धेरे का। क्यों नहीं प्रतिवाद किया हर ग़लत फ़ैसले का हर ग़लत सज़ा का? तुम जान-बूझ कर क्यों साथ देती रहीं ग़लत रिवाज़ो का। बेटियां कोख़ में मरती रहीं और द्रौपदियां नग्न होती रहीं और तुम ...

कौन कहता है? – डॉ. मृदुल कीर्ति

Saturday, March 10th, 2012
कौन कहता है? - डॉ. मृदुल कीर्ति कौन कहता है? कौन कहता है कि पीड़ा, पीर देती है ? ऊर्जा इसकी मिला रघुवीर देती है।   जग उठा था दास काली, शब्द के ही दंश से, जग उठा था, दास तुलसी, कटु वचन के अंश से, जग उठा संकल्प ध्रुव का, जा मिला सर्वांश से, चुभन इसकी ज्ञान भी गंभीर देती है, ऊर्जा इसकी मिला ...

स्त्री विमर्श पर दो रचनाएं – डॉ. वेद व्यथित

Friday, February 17th, 2012
स्त्री विमर्श पर दो रचनाएं - डॉ. वेद व्यथित तुम्हारा मौन  तुम्हारा मौनकितना कोलाहल भरा थालगा था कहींबादलों कि गर्जन के साथबिजली न तडक उठेतुम्हारे मौन का गर्जनशायद समुद्र के रौरव से भीअधिक भयंकर  रहा होगाऔर उस में निरंतरउठी होंगी उत्ताल तरंगेंतुम्हारे मौन मेंउठते ही रहे होंगेभयंकर भूकम्पजिन से हिल गया होगापृथ्वी से भी बडा तुम्हारा ह्रदयइसी लिए मैं कहता ...

शैल अग्रवाल की कविताएं

Friday, January 20th, 2012
शैल अग्रवाल की कविताएं एक और सच सूर्यवंशी होना ही सब कुछ नहीं ये कवच और कुंडल तो हमेशा दान ही हुए हैं या फिर छीने गए हैं हर शक्ति और गरिमा से बात बस एक है जरा शब्दों का फेर है युद्ध में शस्त्रों की जगह माँ का आँचल था और ...

दिखाने आया हूँ – डॉ. वी.डी. शर्मा

Tuesday, January 17th, 2012
दिखाने आया हूँ - डॉ. वी.डी. शर्मा दिखाने आया हूँ मुझे नहीं है शौक किसी के, गीत विरोधी गाने का,नहीं मेरा व्यवसाय किसी का, मूंह काला दिखलाने कापर जब माता और बेटों को, दुष्ट कभी भटकाते है,दिल में उठे बादल पीड़ा के, जिह्वा पर आ जाते है।उन्ही भावो को आज तुम्हारे, सम्मुख गाने आया हूं,सच मानो मैं उन्हीं ...
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