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Posts Tagged ‘प्रवासी कविता’


डॉ. पद्मेश गुप्त के जन्मदिन के अवसर पर बहुत – बहुत शुभकामनाएँ

Saturday, January 5th, 2013
डॉ. पद्मेश गुप्त के जन्मदिन के अवसर पर बहुत - बहुत शुभकामनाएँ   डॉ. पदमेश गुप्त ब्रिटेन में हिंदी के स्तंभ है। 6वें विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक और आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयार्क में विश्व हिंदी सम्मान से सम्मानित कवि, कहानीकार, संपादक  डॉ पद्मेश गुप्त का पांच जनवरी को जन्मदिवस  है।  उनके स्वस्थ व रचनात्मक जीवन और दीर्घायु के लिए प्रवासी ...

लन्दन के चेरिंग क्रास के लोग – शब्द चित्रों में – डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव

Tuesday, October 9th, 2012
लन्दन के  चेरिंग  क्रास के लोग - शब्द चित्रों में - डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव रात आधी सो रहे कुछ लोग पुल के पास साथ कुछ रंगीन चेहरे मांगते सहवास गाड़ियों और मनुष्यों की झेलकर रफ़्तार ऊंघता लन्दन शहर का व्यस्त चेरिंग क्रास . यहाँ से जो कुछ गया झकझोर कर ही गया बढ़ आई और जल पथ मोड़ कर ही गया नित नए अनुभव मगर क्षण -क्षण पुराने हुए और जो बच सका कुछ निचोड़ कर ही गया . महावृक्ष खड़ा रहा धुप ...

क्या भूलू क्या याद करू – शैल चतुर्वेदी

Thursday, May 3rd, 2012
क्या भूलू क्या याद करू - शैल चतुर्वेदी आस्ट्रेलिया से प्रवासी   संवेदना की एक भावनात्मक कविता जल जल कर बुझ गए दिए सब तेरी आस लगाये तू आया निर्मोही जब बिखरे है काले साए योवन की हर ऋतू हंसती आती थी रोती जाए तुझको पाने की आशाये धूमिल सी कर जाए क्या भूलू क्या याद करू यह उलझी हुई कहानी है सूरज नहीं उगा ...

हमें नस्लवादिता से ऊपर उठना होगा – डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव

Monday, October 10th, 2011
हमें नस्लवादिता से ऊपर उठना होगा - डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव लंदन में रह रहे कैम्ब्रिज विश्वविधालय के हिंदी प्रोफेसर, कवि डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव के साथ श्री अनिल शर्मा  ‘जोशी’ ने पिछले दिनों एक अंतरंग बातचीत की। यहां प्रस्तुत है उस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश....अनिल शर्मा ‘जोशी’- डॉ. साहब आपके साहित्य में एक तरफ तो भारत के प्रति असीम लगाव ...

मेरी कहानियां संस्कृति , समन्वय और मेरी अंतस् की टीस की अकुलाहट की अभिव्यक्ति हैं.. उषा राजे सक्सेना

Wednesday, August 3rd, 2011
 मेरी कहानियां संस्कृति , समन्वय और मेरी अंतस् की टीस की अकुलाहट की अभिव्यक्ति हैं..  उषा राजे सक्सेना   ( उषा राजे सक्सेना एक चर्चित प्रवासी रचनाकार हैं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी उषा राजे की कहानियां प्रवासी जीवन की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। हिंदी के लिए समर्पित उषा राजे हिंदी के आयोजनों से जु़ड़ी रही हैं और विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर ब्रिटेन और वैश्विक स्तर पर आयोजित हिंदी ...

डॉ.सत्येन्द्र श्रीवास्तव – प्रवासी साहित्य के शीर्ष पुरूष

Thursday, July 28th, 2011
डॉ.सत्येन्द्र श्रीवास्तव - प्रवासी साहित्य के शीर्ष पुरूष .सन् 1935 में जन्में डा.सत्येन्द्र श्रीवास्तव जी की प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी के सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल में हुई तथा उच्च शिक्षा काशी,  पूना एंव लंदन विश्वविधालय में हुई । आपने टोरेन्टो विश्वविधालय ,लदंन विश्वविधालय तथा सिटी यूनिवसिटी में अध्यापन का कार्य किया है।  आप कैम्ब्रिज विश्वविधालय से सेवानिवृत है और स्वतंत्र ...

तरक्की पर भारत – दिव्या माथुर

Wednesday, July 27th, 2011
तरक्की पर भारत - दिव्या माथुर सुना हैभारत बड़ी तरक्की कर रहा हैजिसे देखो ऊपर, ऊपर और ऊपर हीचढ़ रहा हैसुना हैकिसान अब अपने बीज नहीं बो सकतेन ही वे बांट सकते हैं अपने ही जाए बीज अपनों कोसुना हैबैंक तैयार हैं कर्ज़ देने को बीजजिनकी फ़सलें होंगी रंगीन और पुष्ट पर बेस्वाद और फुसफुसीसुना हैगांव के गांव बिकाऊ ...

डा. पद्रमेश गुप्त – समर्पित हिंदी सेवी व साहित्यकार की प्रतिनिधि कविताएं

Monday, July 25th, 2011
डा. पद्रमेश गुप्त - समर्पित हिंदी सेवी व साहित्यकार की प्रतिनिधि कविताएं जन्मः 5 जनवरी 1965 को लखनऊ के समाजसेवी एवं प्रतिष्ठित परिवार में जन्म।परिचय एवं उप्लब्धियां : लामाचर्टीनियर कालेज, क्रिश्चियन कालेज एवं लखनऊ यूनिवसिटी से शिक्षा प्राप्त करने के बाद “इन्स्टीट्यूट आफ रुर बैतरां, ड्यूपा, फ्रांस में केमिकल इंजिनियरिगं का अध्ययन तथा कास्मेटिक इन्डस्ट्रीज पर शोध कार्य। वर्तमान मे आक्सफोर्ड बिजनेस ...

लेखिका इन्द्रा धीर वडेरा की कविताएँ

Wednesday, June 1st, 2011
लेखिका इन्द्रा धीर वडेरा की कविताएँ  इन्द्रा धीर वडेरा पंजाब यूनिवर्सिटी से एम.एससी.ऑनर्स कर लेने के बाद हंसराज महिला कॉलेज जालंधर में हैड ऑफ द बोटनी डिपार्टमेंट थीं, अब 25 से ज्यादा वर्षों से कैनेडा में साधना सिख रही हैं। पाक्षिक पत्रिका 'सिल्वर वैब'में'आस्क इन्द्रा 'कॉलम और त्रैमासिक पत्रिका 'हिंदी चेतना' में 'प्रज्ञा परिशोधन' के माध्यम से ...

हिन्दी सेवकों की थाली में: सत्येन्द्र श्रीवास्तव

Thursday, May 26th, 2011
हिन्दी सेवकों की थाली में: सत्येन्द्र श्रीवास्तव  हिन्दी सेवकों की थाली में डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं  तात्कालिक संदर्भों से लेकर वृहतर संदर्भों की यात्रा करती है। इधर कुछ घटनाएं ऐसी हुई कि जिन्होंने उन्हें व्यथित किया। उनका कहना है की यह कविता हिंदी की दुर्दशा पर नहीं है बल्कि कुछ अवसरवादी स्वार्थी ...
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