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दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

Posts Tagged ‘हिन्दी कविता’


गोपालदास ‘नीरज’- जन्म दिवस

Friday, January 2nd, 2015
गोपालदास 'नीरज'- जन्म दिवस गोपालदास सक्सैना 'नीरज' (जन्म- 4 जनवरी, 1925, पुरावली, इटावा, उत्तरप्रदेश) वर्तमान समय में सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध कवि हैं, जिन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सरल भाषा द्वारा हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया है और बच्चन जी के बाद नयी पीढी को सर्वाधिक प्रभावित किया है। नीरज जी से ...

किताबों का एक अनोखा संसार है – डॉ.प्रीत अरोड़ा

Thursday, August 9th, 2012
किताबों का एक अनोखा संसार है - डॉ.प्रीत अरोड़ा किताबों की दुनिया    किताबों का एक अनोखा संसार है     जिसमे ज्ञान का अक्षय भण्डार है       मानो या न मानो   किताबों से ही जीवन में बहार है किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त हैं    जो हमें जीना सिखाती हैं    शिक्षिका के रूप में हमें पढ़ाकर साक्षर बनाती हैं किताबें परियों की कहानी सुनाती हैं ये अनकही ...

बाबा तथा जंगलः अशोक आंद्रे

Thursday, April 5th, 2012
बाबा तथा जंगलः अशोक आंद्रे बाबा तथा जंगल परीकथाओं सा होता है जंगल नारियल की तरह ठोस लेकिन अन्दर से मुलायम तभी तो तपस्वी मौन व्रत लिए उसके आगोश में निरंतर चिंतन मुद्रा में लीन रहते हैं बाबा ऐसा कहा करते थे इधर पता नहीं वे, आकाश की किस गहराई को छूते रहते और पैरों के नीचे दबे किस अज्ञात को देखकर मंद-मंद मुस्कराते रहते थे उन्हीं पैरों ...

डॉ. प्रीत अरोड़ा की कविता ‘कशमकश’

Thursday, March 29th, 2012
डॉ. प्रीत अरोड़ा की कविता ‘कशमकश’ कशमकश जीवन एक सतत् प्रयास है, जिसमें हर क्षण एक मधुर एहसास है। इसी एहसास से फिर हम आगे बढ़ते हैं अतः संघर्ष व प्रतियोगिता में पड़ते हैं। ऐसे भाव लेकर फिर, धर्म ,पैसे व रिश्तों के नाम पर क्यों लड़ते हैं? रिश्तों की इस लड़ाई में अब बदल चुकी है, "अपनी  परिभाषा " पुनः मधुर एवं प्रेम भाव ...

प्रवासी साहित्यकार डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव की अप्रतिम रचनाएँ

Wednesday, March 28th, 2012
प्रवासी साहित्यकार डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव की अप्रतिम रचनाएँ चेरिगंक्रास रात आधी सो रहे कुछ लोग पुल के पास दूर कुछ रंगीन चेहरे मांगते सहवास, गाडि़यों और मनुष्यों की झेलकर रफ्तार ऊँघता लन्दन शहर का व्यस्त चेरिगंक्रास *** यहां से जो कुछ गया झकझोर कर ही गया, बाढ़ आई और जल  पथ मोड़ कर ही गया नए थे अनुभव मगर क्षण में पुराने हुए और हर क्षण कुछ मुझे निचोड़ कर ही गया *** रातों का महावृक्ष वहाँ खड़ा रहा और धूप उतर गई... एक डाल और कटी भाव लगा ट्रक ...

कई मुद्दों को समाहित करती अशोक आंद्रे की कविता ‘मुद्दे’

Thursday, March 22nd, 2012
कई मुद्दों को समाहित करती अशोक आंद्रे की कविता ‘मुद्दे’ मुद्दे मुद्दों की बात करते-करते वे अक्सर रोने लगते हैं। उनका रोना उस वक्त कुछ ज्यादा बड़ा आकार लेने लगता है जब कटोरी में से दाल खाने के लिए चम्मच भी नहीं हिलाई जाती उनसे, मुद्दों की बात करते-करते कई बार वे हंसने भी लगते हैं क्योंकि उनकी कुर्सी के नीचे काफी हवा भर गयी होती है मुद्दों की बात करते-करते वे ...

ब्रह्मपुत्र वियोगः रमेश कुमार शर्मा

Saturday, March 17th, 2012
ब्रह्मपुत्र वियोगः रमेश कुमार शर्मा ब्रह्मपुत्र वियोग कैसे होली पर्व मनाऊँ। बन्द ब्रह्मसुत की कल-कल घ्वनि, फिर कैसे मैं चंग बजाऊँ आज असम, अरूणाचल सूखे, कैसे ठंडाई गटकाऊँ कैसे होली पर्व मनाऊँ। चीन ‘पड़ौसी’ का छल है या अपने कर्मों का ही फल है हमने खनन किया हिमगिरि का, पलट गया सरिता का जल है चीन झटक जाये जल मेरा, मैं न ...

आकर्षणः डॉ. वेद व्यथित

Friday, March 16th, 2012
आकर्षणः डॉ. वेद व्यथित आकर्षण काजल की रेख कहीं अंदर तक पैठ  गई तमस की आकृतियाँ अंतर की सुरत हुईं मन को झकझोर दिया गहरी सी सांसों ने || दूर कहाँ रह पाया आकर्षण विद्युत सा अंग अंग संग रहा तमस बहु रंग हुआ गहरे तक डूब गया अपनी ही साँसों में || चाहा तो दूर रहूँ शक्त नही मन था कोमल थे तार बहुत टूटन का डर था सोचा संगीत ...

परछाइयां: नरेश भारतीय

Thursday, March 15th, 2012
परछाइयां: नरेश भारतीय परछाइयां कल के सच की परछाइयां आज के झूठ को जब सच मानने से इन्कार करतीं हैं तो बीते कल की अनुभूतियां जीवंत हो उठती हैं जीवन सत्य को जो रचती रहीं – मैं नहीं जानता आज के जीवन सत्य कितनी गहराइयों में पैठ कर घोषित किए गए हैं और यह भी कि क्या वे सत्य ही हैं ! क्योंकि – गिर रहे हैं ...

समीक्षाः डॉ. ज़ेबा रशीद (औपन्यासिक नारी जीवन की विवेचना करती कविता)

Tuesday, March 13th, 2012
समीक्षाः डॉ. ज़ेबा रशीद (औपन्यासिक नारी जीवन की विवेचना करती कविता) समीक्षा तेरे लिखे की समीक्षा लिखूं सोच रही हूं मैं ! जिन्दगी का विशालकाय ग्रंथ गर्म-ठंडी बयार और फड़फड़ाती ऋतुओं से है जिसमें असंख्य पन्ने, और परबस हूं मैं जिनकी समीक्षा मेरे बस में नहीं है ! जब मैं सम्पूर्ण पृष्ट पढ़ लूंगी मेरे जीवन ग्रंथ की तब लिखूंगी समीक्षा मैं ! कथ्य और शिल्प में कोई योग नहीं यह क्या रचा है तूने तेरे रचे में बहुत सी ...
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