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कविताऐं – आज मन अधीर है और चेतावनी – शशि पाधा

Friday, August 16th, 2013
कविताऐं - आज मन अधीर है और चेतावनी - शशि पाधा आज मन अधीर है  काँपती कोमल धरा अब मन में गहरी पीर है | कान मेरे सुन रहे शोर चीत्कार अब आँख खोलूँ  तो मैं देखूँ संहार –हाहाकार अब   शान्ति के देवता के पाँव में जंजीर है    आज मन अधीर है | हरित धरा की ओढ़नी रक्त रंजित मत करो खेलना है रंग से तो प्रेम का ही रंग भरो मातृभूमि ...

चाँद मेरा खो गया – सुलेखा डोगरा

Monday, February 25th, 2013
 चाँद मेरा खो गया - सुलेखा डोगरा रात काली सर्द सर्द दिल में था इक चुभता  सा दर्द झाँक कर खिड़की से देखूँ नीला अंबर सुरमई गया, सिमट कर छोटा हो गया है चाँद मेरा खो गया, है चाँद मेरा खो गया ओढ़ कर काली घटायें, चाँदनी को संग लेकर शायद वो छिप कर सो गया है चाँद मेरा खो गया, है चाँद मेरा ...

गर्भ में नष्ट की गई इक बिटिया की गुहार

Sunday, January 20th, 2013
गर्भ में नष्ट की गई इक बिटिया की गुहार थी इक बंद कली मैं , पल रही थी मां के अंदर बंद पलके, अधपके अंग जैसे किसी कारागार में हू  मैं नजरबंद जीने की चाहत थी मेरे भी मन के अंदर बाहर निकल कर देखना चाहती थी,  इस दुनिया के रंग ढंग इतराती थी सोचकर मैं , इतराती थी सोच कर मैं कि मेरी मां ...

अजन्माशैशव – शशि पाधा

Wednesday, January 16th, 2013
अजन्माशैशव - शशि पाधा विदा की अंतिम वेला में माँ पूछूं  तुमसे एक सवाल अजन्मी तेरी बिटिया नन्हीं क्यों छीने तुमसे महाकाल? अभी न खेले खेल खिलौने न कोई तीज त्यौहार, अभी न देखी सूरत तेरी अभी न पाया प्यार अभी न देखे चन्दा सूरज ना तारों की छाँव अभी न देखे ऋतुओं के रंग ना गलियाँ ना  गाँव नन्हें नन्हें अंग हैं मेरे  गिनें चुनें हैं ...

युवा प्रवासी कवि दीपक मशाल के जन्मदिन 24 सितंबर पर उनको शुभकामनाएं

Monday, September 24th, 2012
युवा प्रवासी कवि दीपक मशाल के जन्मदिन 24 सितंबर पर उनको शुभकामनाएं युवाकवि , लघुकथा लेखक, व्यंग्यकार,हिदी सेवी को उनके जन्मदिन 24 सितंबर के अवसर पर बहुत -बहुत शुभकामनाएं। इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक प्रतिनिधि रचना तुमने काले घोड़े की नाल देखी है? गलियों में बड़बड़ाते हुए पागल के ये अस्पष्ट शब्द लोग हँसते उसकी बात पर कभी लगता ज्यों वो कहता हो 'तुम अचंभित ...

प्रकृति की छवि – लावण्या दीपक शाह

Tuesday, June 12th, 2012
प्रकृति की छवि - लावण्या दीपक  शाह   प्रकृति की छवि ( १ )  तुम सँध्याके रँगोँ मेँ आतीँ और आकर मँडरातीँ, बुलबुल बन, मनके बन को, कर देतीँ आलोडित ! फिर पुकार बिरहा के बैन नशीले, बुलबुल तू, दिल को तडपा जातीँ !   बुलबुल, जो तू, मैँ होती...   बनी बावरी जो तू आती-   मेरे जीवन के सूने आँगन को,   भर दे जाती री ~ सुहाग राग!   (२)   अलसायी रेत झीनी, किनारे की, मानोँ ...

क्या भूलू क्या याद करू – शैल चतुर्वेदी

Thursday, May 3rd, 2012
क्या भूलू क्या याद करू - शैल चतुर्वेदी आस्ट्रेलिया से प्रवासी   संवेदना की एक भावनात्मक कविता जल जल कर बुझ गए दिए सब तेरी आस लगाये तू आया निर्मोही जब बिखरे है काले साए योवन की हर ऋतू हंसती आती थी रोती जाए तुझको पाने की आशाये धूमिल सी कर जाए क्या भूलू क्या याद करू यह उलझी हुई कहानी है सूरज नहीं उगा ...

अमेरिकी प्रवासी साहित्य में हिन्दी कविता – देवी नागरानी

Monday, March 12th, 2012
अमेरिकी प्रवासी साहित्य में हिन्दी कविता - देवी नागरानी रचना की हर विधा की अपनी एक पहचान है लेकिन उसके अस्तित्व का भव्य भवन शब्द के तानों-बानों से बुनी हुई एक वाटिका है जो सोच की उधेड़-बुन की उपज है. प्रो॰ रमेश तिवारी ‘विराम’ जी ने अनछुए को छुआ है और अनकहे को कहते हुए लिखा है “समर्थ साहित्यकार ...

कौन कहता है? – डॉ. मृदुल कीर्ति

Saturday, March 10th, 2012
कौन कहता है? - डॉ. मृदुल कीर्ति कौन कहता है? कौन कहता है कि पीड़ा, पीर देती है ? ऊर्जा इसकी मिला रघुवीर देती है।   जग उठा था दास काली, शब्द के ही दंश से, जग उठा था, दास तुलसी, कटु वचन के अंश से, जग उठा संकल्प ध्रुव का, जा मिला सर्वांश से, चुभन इसकी ज्ञान भी गंभीर देती है, ऊर्जा इसकी मिला ...

डॉ.मृदुल कीर्ति की रचनाएँ

Saturday, February 11th, 2012
डॉ.मृदुल कीर्ति की रचनाएँ सुख-दुःख के छोर सम्यक, सम्बद्ध  उदयन ! मेरे मर्म की पीड़ा से बोल रहे हो. क्यों हम अपने में नहीं  अन्यों में जीते हैं? क्यों हम अपने सुख-दुःख का छोर अन्यों को  दे देते है. क्यों हम सुख के लिए भिखारी हो जाते हैं? क्यों हम दुःख में निःसत्व, सार, शक्ति-हीन कातर हो जाते हैं? क्यों हम स्वत्व की सत्ता ...
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