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ईशावास्योपनिषद – भावानुवाद – डॉ मृदुल कीर्ति

Sunday, August 19th, 2012
ईशावास्योपनिषद – भावानुवाद – डॉ मृदुल कीर्ति अनेजदैकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन पूर्वमर्षत। तद्धावतो न्यानत्येति तिष्ठत तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४॥ है ब्रह्म एक, अचल व मन की गति से भी गतिमान है, ज्ञानस्वरूपी, आदि कारण, सृष्टि का है महान है। स्थित स्वयं गतिमान का, करे अतिक्रमण अद्भुत महे, अज्ञेय देवों से, वायु वर्षा, ब्रह्म से उदभुत अहे॥ [४]

आज का मंत्र ईशावास्योपनिषद – भावानुवाद – डॉ मृदुल कीर्ति

Friday, June 15th, 2012
आज का मंत्र ईशावास्योपनिषद - भावानुवाद - डॉ मृदुल कीर्ति यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद विजानतः। तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥ सर्वत्र भगवत दृष्टि अथ जब प्राणी को प्राप्तव्य हो, प्रति प्राणी में एक मात्र, श्री परमात्मा ज्ञातव्य हो। फिर शोक मोह विकार मन के शेष उसके विशेष हों, एकमेव हो उसे ब्रह्म दर्शन, शेष दृश्य निःशेष हों॥ [७] 

आज का मंत्र- ईशावास्योपनिषद – भावानुवाद- डॉ मृदुल कीर्ति

Sunday, June 10th, 2012
आज का मंत्र- ईशावास्योपनिषद - भावानुवाद- डॉ मृदुल कीर्ति तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥५॥ चलते भी हैं, प्रभु नहीं भी, प्रभु दूर से भी दूर हैं, अत्यन्त है सामीप्य लगता, दूर हैं कि सुदूर हैं। ब्रह्माण्ड के अणु कण में व्यापक, पूर्ण प्रभु परिपूर्ण है, बाह्य अन्तः जगत में, वही व्याप्त है सम्पूर्ण है॥ [५]

आज का मंत्र ईशावास्योपनिषद- भावानुवाद – डॉ मृदुल कीर्ति

Friday, June 8th, 2012
आज का मंत्र ईशावास्योपनिषद- भावानुवाद - डॉ मृदुल कीर्ति असुर्या नाम ते लोका अंधेन तमसा वृताः। ता स्ते प्रेत्याभिगछन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥ अज्ञान तम आवृत्त विविध बहु लोक योनि जन्म हैं, जो भोग विषयासक्त, वे बहु जन्म लेते, निम्न हैं। पुनरापि जनम मरण के दुख से, दुखित वे अतिशय रहें, जग, जन्म, दुख, दारुण, व्यथा, व्याकुल, व्यथित होकर ...

उपनिषद् में वर्णित एक कथ्य का काव्य रुपान्तरण

Monday, October 17th, 2011
परिकल्पनाकामख्या पहाड़ के ऊपरी सिरे पर खड़े होकरएक विस्तार जागता हैप्रकृति प्रदत्तदेव प्रदत्तसंचरित सुगंधा पवन आकाश की गोलाई में तना सूक्ष्म नील बिम्बदूर उसके कोड़ में सिमटी नदी की रेखबृह्मपुत्र अनेकानेक बस्तियॉलोक - अलोक सरीखेयहॉ - वहॉ  बिखरे हुए विस्तार वहॉ ठिठककरस्वयं को विस्तृत होने देता हैअपने कुहरे ढंके दृगों को पूर्ण उन्मीलितदेव ...