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विधि में हिन्दी लेखक ब्रजकिशोर शर्मा


विधि की शब्दावली और विधि का अनुवाद

लेखक: ब्रजकिशोर शर्मा

पृष्ठ: 248

मूल्य: 225 रुपये

प्रकाशक: पी.एच.आई.लर्निंग प्रा.लि.

इतिहास, प्रकिया, सिद्धांत और प्रयुक्ति इन चार भागों में बंटी प्रस्तुत पुस्तक अपने विषय पर एक आधिकारिक ग्रंथ है। इतिहास अधयाय के अंतर्गत लेखक ने समकालीन शासकीय स्थिति का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है जिसमें राजभाषा के विषय में निश्चय किया जाना था। लेखक ने दिखाया है कि संघ सरकार और घटक सरकारों के जो भी अधिकारी और कर्मचारी थे वे अंग्रेजी के माध्यम से सरकारी सेवा में प्रविष्ट हुए थे और उसी भाषा में काम करने में अपना बड़प्पन और अपनी प्रतिष्ठा समझते थे, भले ही अंग्रेजी का उनका ज्ञान कितना ही लचर क्यों न हो। इनकी अंदरूनी इच्छा थी कि राजभाषा अंग्रेजी ही बनी रहे। पर, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इस दबाव समूह का सामना किया। उन्होंने संविधान सभा में यह विचार आरंभ में ही प्रकट किया कि स्वतंत्र भारत की गरिमा के अनुकूल तो यही होगा कि संविधान अपनी ही भाषा में हो और सभा के सब सदस्यों ने इस विचार का स्वागत किया था। लेखक ने पुस्तक में पण्डित नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पं. गोविंद वल्लभ पंत और श्री गोविंद मेनन आदि राजनेताओं और डॉ. रघुवीर, पं. राहुल सांकृत्यांयन, डॉ. सुनीति कु. चटर्जी और श्री बालकृष्णन आदि विद्वानों की भूमिका का उल्लेख किया है।

लेखक ने डॉ. रघुवीर के उन विचारों की तर्कसम्मतता स्थापित की है जिसके तहत विज्ञान या मानविकी किसी भी क्षेत्र से आने वाली नई संकल्पनाओं के लिए नए शब्द संस्कृत के सहारे बनाने के सिद्धांत को स्वीकार किया। स्वयं लेखक ने जब विधि मंत्रालय में एक प्रशासनिक पद पर काम करना शुरू किया तो विधि के क्षेत्र में शब्दावली निर्माण के लिए अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति भी उन्होंने खुला दृष्टिकोण रखा। लेखक के इस कथन में हिंदी सेवा के उनके संघर्ष की टीस छिपी है कि जब एक आईसीएस सचिव ने उनसे यह कहा था कि तुम लड़के हो अपना जीवन व्यर्थ में यह काम करने में नष्ट कर रहे हो, हिंदी भारत की राजभाषा कभी नहीं होगी।

विधि व अन्य पारिभाषिक शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया के अंतर्गत लेखक ने शुद्धतावादी, हिंदुस्तानीवादी और मध्यमार्गी इन तीनों मार्गों के मूल तर्कों और संबंधित बहस को प्रस्तुत करते हुए अंतत: वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग व अन्य संस्थाओं और विद्वानों द्वारा मान्य सिद्धांतों का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है। मूल सिद्धांत यह है कि एक निश्चित संकल्पना के लिए एक निश्चित पर्याय रखा जाना चाहिए और यह अपनी ही भाषिक स्रोत से लिया जाना चाहिए। संकल्पना बीज है। उसी शब्द से नए विचारों के अंकुर फूटते हैं। यही बीज विदेशी भाषा का होगा तो देशज भाषा में उगेगा नहीं। लेखक ने शब्दावली निर्माण के और विधिक अनुवाद के सिद्धांतों के साथ-साथ विधि के क्षेत्र के अनेकों शब्दों के चयन के ऐतिहासिक कारण, भाषाशास्त्रीय आधार और सांस्कृतिक निहितार्थ का भरपूर वर्णन किया है।

निस्संदेह यह पुस्तक हिंदी भाषा के अध्ययन के लिए मार्गदर्शक है।

प्र.टु. ब्यूरो,

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