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वतर्मान परिप्रेक्ष्य में मई दिवस की प्रासंगिकता ! – डॉ. भरत मिश्र प्राची


 भूमंडलीयकरण के इस युग में सबसे ज्यादा प्रभावित आज का मेहनतकश वर्ग हुआ है। सरकार की नई आर्थिक नीतियो के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक बड़े -बड़े उद्योग घाटे के नाम से कुछ बंद कर दिये गये तो कुछ निजी हाथों में सौंप दिये गये। इन उद्योगों में कार्य कर रहे अधिकांश लोगों को स्वैच्छिक सेवा के तहत कार्य सेवा से बहुत पहले ही मुक्त कर बेरोजगार की पंक्ति में खड़ा कर दिया गया। आज उन सभी के परिवार के सामने रोटी के लाले पड़े है। इस दिशा में मजदूरों के हित के लिया बना संगठन भी कुछ नहीं कर पाया। आज हालात ऐसे उभर चले है कि मजदूर संगठनों की आवाज भी नहीं सुनी जा रही है। इसका ताजा उदाहरण है कि अभी हाल ही में देश के समस्त मजदूर संगठनों ने सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों एवं बढ़ती महंगाई को लेकर एक दिन की आम हड़ताल की पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। इस हड़ताल में पहली बार देश के सभी श्रमिक संगठन शामिल हुए तथा औद्योगिक क्षेत्रों,  सार्वजनिक बैंकों में हड़ताल शत् प्रतिशत सफल रही। करोडों का नुकसान हुआ। श्रमिकों की एक दिन की मजदूरी कटी पर सरकार पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। उलटे मजदूरों की गाढ़ी कमाई से एकत्रित की गई भविष्य निधि की राशि पर व्याज दर घटा दी गई। जो कुछ नुकसान हुआ देश का हुआ, आम जन का हुआ,मजदूरों का हुआ जिससे इनका कोई लेना देना नहीं। इसकी भरपाई तो देश की अवाम टैक्स भरकर कर ही देगी। फिर हड़ताल हो या बंद, क्या फर्क पड़ता ? इस तरह के बदलते परिवेश में देश के श्रमिक संगठनों को मई दिवस की प्रासंगिकता के संदर्भ में श्रमिकों के हित में अपनी कार्यशैली, सोच एवं तौर तरीके बदलने होंगे।

        श्रम,  श्रमिक,  श्रमिक संगठन एवं श्रमिक दिवस एक दूसरे के पूरक है। श्रमिक श्रम करता है और उसके हक दिलाने , हित की रक्षा करने एवं सामाजिक सुरक्षा बहाल करने के दायित्व का भार अपने कंधों पर लेने का संकल्प श्रमिक संगठन लेता है। इसके लिये जरूरत पड़ने पर धरना, घेराव, प्रर्दशन, अनशन, हड़ताल आदि का सहारा लेकर श्रमिक विरोधी व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करता है। श्रमिक दिवस श्रमिकों का राष्ट्रीय त्योहार है जिस दिन दुनियां के श्रमिक संगठन जगह – जगह समारोह आयोजित कर श्रमिकों के मौलिक चेतना को जगाने एवं मालिक वर्ग को बताने का प्रयास करते है कि श्रमिक वर्ग के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार एवं क्रियाकलाप किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किये जायेंगे। इस तरह के उदेश्य को लेकर यहां के सभी श्रमिक संगठन अपने – अपने तरीके से कार्य कर रहे है पर आज मेहनतकश वर्ग सबसे ज्यादा असुरक्षित हो चला है।

    वर्तमान समय में देश में श्रमिक हित हेतु गठित मुख्यतः अखिल भारतीय स्तर के चार-पांच श्रमिक संगठन हैं जिनमें प्रमुख हैं भाकपा की नीतियों से जुड़ी अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), माकपा से जुड़ी सेन्टर ऑफ ट्रेड यूनियन (सीटू), कांग्रेस की छत्रछाया पायी भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भाजपा के विचारधारा से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) है। इनके अलावा इन्हीं के बीच से स्वार्थ वशीभूत होकर आपसी मतभेद के कारण उभरे अनेक श्रमिक संगठन भी हैं जिनमें हिन्दुस्तान मजदूर पंचायत, हिन्दुस्तान मजदूर सभा, किसान ट्रेड यूनियन आदि। जिनपर भी किसी न किसी राजनीतिक दलों की छाया विराजमान है। श्रमिकों के हित का संकल्प लेने वाले ये श्रमिक संगठन देश के मजदूरों को कभी भी एक मंच पर होने नहीं देते। देश के प्रायः सभी संगठन 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते तो है।पर संगठन का एक मंच न होना, मई दिवस की प्रासंगिकता को एक मायने में नकारता भी है।

                इसी परिवेश के कारण आज यहां का श्रमिक वर्ग दिन पर दिन शोषण का शिकार होता जा रहा है। श्रमिकों के हित की सुरक्षा खतरे में पड़ती जा रही है तथा पूंजीवादी व्यवस्था उन पर हावी होती जा रही है। देश में जब कभी भी श्रमिकों के हित में श्रमिक संगठनों द्वारा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन की बात उठती रही है तब-तब अलग-अलग खेमे में बंटे होने के कारण इस तरह के आंदोलन को सफलता नहीं मिल पायी है। जिसके कारण श्रमिकों की समस्या आज ज्यों की त्यों रह गयी है। जब कभी भी देश में श्रमिक संगठनों के बीच इस दिशा में एक होकर आवाज उठी है वह आवाज परिवर्तन का कारण बनी है। इतिहास साक्षी है। परन्तु इस तरह की स्थिति बिरले ही हो पाती है। आर्थिक उदारीकरण आज देश का ज्वलंत मुद्दा है। जिससे यहां का संगठित-असंगठित सभी प्रकार का श्रमिक वर्ग प्रभावित हो रहा है। इस नीति के कारण देश के उद्योग धंधों पर प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ ही रहा है, भारतीय व्यापार भी ठप्प होते जा रहे हैं। लाखों लोगों को रोजगार देने वाले सार्वजनिक प्रतिष्ठान धीरे-धीरे बंद होने के कगार पर खड़े होते दिखाई दे रहे हैं। मल्टीइंटरनेशनल कंपनियों की बाढ़ ने सामान्य मजदूर का जीना ही मुश्किल कर दिया है। नये श्रमिक कानून के फंदे में श्रमिकों को फंसाने की आज साजिश चल रही है। जहां सामाजिक सुरक्षा नाम की कोई चीज ही नहीं है। जहां पूंजीवादी व्यवस्था की मनमर्जी की दास्ताने लिखी जा रही है। बंदीकरण एवं छंटनी का स्वरूप इस परिवेश में उभरता साफ-साफ दिखाई देने लगा है। जहां स्वतः ही लाखों लोगों के बेकार होने की संभावनाएं उभर चली हैं। यह समस्या सभी प्रकार के श्रमिक वर्ग के सामने हैं। इस बात को जबकि अब धीरे-धीरे सभी श्रमिक संगठन समझने तो लगे हैं परन्तु अलग-अलग रंग में रंगे होने के कारण एक मंच पर उनका खड़ा हो पाना संभव नहीं दिखाई देता। जहां मई दिवस की प्रासंगिकता धूमिल होती नजर आ रही है।

– स्वतंत्र पत्रकार,

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