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डॉ चैतन्य प्रकाश की पुस्तक विषयांतर के कुछ अंश


chaitanya prakash

 पुस्तक  लोकार्पण कार्यक्रम

 पुस्तक   का नाम – विषयांतर

लेखक –  प्रोफेसर डॉ चैतन्य प्रकाश

27 मार्च को सायं 5.30 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी में आयोजित किया जा रहा है।

ओसाका विश्वविद्यालय जापान में एसोशिएट प्रोफेसर डॉ चैतन्य प्रकाश एक मौलिक चिंतक और विचारक हैं। हाल में ही सुमेधा प्रकाशन से उनके लेखों का संग्रह विषयांतर प्रकाशित हुआ है। पुस्तक का लोकार्पण कार्यक्रम बृहस्पतिवार, 27 मार्च को सायं 5.30 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी में आयोजित किया जा रहा है।    समसामयिक विषयों पर उनका लेखन तात्कालिकता और व्यक्तियों और घटनाओं के चर्चा करने के बजाए उनमें निहित मानवीय पहलूओं, संवेदनाओं, गहरे सरोकारों, समाज जीवन के बदलते परिदृश्य ,    मूल्यों के सिकुड़न, आधुनिक संदर्भों और   शाश्वत तत्वबोध को उजागर करते हैं। इसके चलते ये लेख निबंध बन गए हैं।    सूक्तियां गड़ते, स्थितियों और घटनाओं की असाधारण व्याख्या करते ये लेख ना केवल अपने समय के महत्वपूर्ण द्स्तावेज हैं बल्कि  साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। ये लेख साहित्यिक पत्रकारिता के विलक्षण उदाहरण हैं और साहित्य – पत्रकारिता का मणिकांचन संयोग है। मौलिक विचारों,  मूल्यबोध और दार्शनिकता की जमीन से दृष्टि और प्राण लेते यह लेख – निबंध समाज के मेनस्ट्रीम सोच के समानांतर एक राह बनाते हैं    और स्टीरियोटाईप सोच से विषयांतर करते हैं। एक संयोग यह भी   है कि यह   पुस्तक प्रयोगधर्मी, प्रतिबद्ध और रचनात्मकता से युक्त प्रकाशन समूह संवाद मीडिया के तत्वावधान में सुमेधा बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है   जो विमल सिंह के नेतृत्व में पत्रकारिता और प्रकाशन में नए और सार्थक प्रतिमान प्रस्तुत कर रहा है।पुस्तक में प्रकाशित लेखों के कुछ प्रमुख अंश दिए जा रहे हैं- 

 पृष्ठ संख्या 11

हमारी समृद्धि अभी आनी शेष है। मगर अंधाधुंध आयोजन-प्रियता का यह रोग समृद्धि की राह में भी रोड़ा है। इंसान अब भी फुटपाथ पर ठंड से ठिठुरकर मर रहा है। किसान कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर रहा है और हम जश्न और जलसों में नाचते हैं, नशे में झूमते हैं। भीतर के आनंद और उल्लास से नहीं बल्कि बाहर से जुटाये झूठे और भ्रामक अहंकार के कारण। क्या यह एक ख़बर नहीं है? यह ख़बर बाहर की नहीं अन्तर्जगत की है। देह के, मन के पार यह ख़बर बड़ी गहरी और गंभीर जान पड़ती है—! आइए इसे सुनकर देखें! भीतर झांककर देखें!!

पृष्ठ संख्या 13

वसंत भीतर और बाहर नवजीवन के विकसित होने का संकेत है। मनुष्य अपने अहं की जड़ता में इस संकेत को समझने, जीने में असमर्थ ही रहता है। वसंत से मनुष्य की मुलाकात कहां हो पाती है?

पृष्ठ संख्या 17

सूरज की बढ़ती उजास हमारी अपनी पहचान को जानने-समझने की प्यास बढ़ाए तो यह ग्रीष्मकाल हमारी गरिमा का स्रोत हो सकता है। जलवायु के वैशिष्ट्य से जीवन-पद्धति का वैशिष्ट्य निर्मित होता है। आरोपित व्यवस्था की गुलामी करते रहना आधुनिकता नहीं है। अपनी स्वस्थ जीवनचर्या के लिए आत्मनिर्भर समाज, पारस्परिक विमर्श और विचार-विनिमय की प्रक्रिया से अपनी व्यवस्था और प्रतीक गढ़ सके, तभी वह जीवंत कहला सकेगा।

पृष्ठ संख्या 19

सूर्य की तपिश प्रकृति का चक्रमण है, फिर भी उससे बचने के उपाय मनुष्य ने खोज लिए हैं। परंतु प्रवृत्ति के विकृतिकरण के लिए जिम्मेदार ‘माथे की गर्मी’ को दूर करने के उपाय ढूंढने में मनुष्य बेहद पीछे है।

पृष्ठ संख्या 24

धरती का प्यारा, लाड़ला पुत्र किसान बुद्धत्त्व की पीठिका पर खड़ा होता है। उसे एक कदम ऊपर उठाना है, फिर वह समष्टि में परमेष्टि का प्रतीक होकर उभर सकता है। पृथ्वी का सारा त्रास मिट सकता है, यदि किसान-बुद्धों का आविर्भाव होने लगे। दुर्योग से किसान इस सदी की विपदाओं में टूट रहा है। मगर इस चौमासे (वर्षा ऋतु) की जल-किल्लोल में प्रकृति का गहन संदेश निहित है- नैराश्य छोड़कर, जागकर बढ़ो! हे भावी बुद्ध, जगत का त्रास घना हो रहा है। तुम्हारे बुद्धत्व की प्रतीक्षा हैं।

 पृष्ठ संख्या 47

व्यक्ति और समाज जीवन की उन्नति के लिए जड़ता को तोड़ना होगा, निद्रा से जागना होगा, तब ही असली स्वराज्य का सपना साकार होगा और संतुष्टि का आनंद भी सर्वत्र उत्पन्न हो सकेगा। इस आनंद की अनुभूति का उत्स छलांग में, कदम उठाकर बढ़ने में है, पहल में हैं, प्रयोग में है। आइये! पहल और प्रयोगों के माध्यम से परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा बनें, एक सकारात्मक चेतना के रूप में विकसित होने के अहसास से लबालब होने का यह विनम्र निमंत्रण है।

पृष्ठ संख्या 50

यह कुहासा, कब, कैसे छंटेगा? कब वह आलोक जो व्यक्ति-व्यक्ति के भीतर है, अपने निरालेपन में, वैशिष्ट्य और वैविध्य के साथ प्रकट हो पाएगा?

पृष्ठ संख्या 53

इस मनोवृत्ति से उबरना होगा, खुले आकाश में पपीहे की तरह पुकार कर जन-जन का आह्वान करना होगा, जिंदगी को ‘बहुजन हिताय’ के नृत्य में उतारना होगा, भरपूर नाचते हुए हर कदम जीना होगा। नदियाँ, तलाब, पोखर, गड्ढे, नाले-क्या सीमाओं में रहकर उन्नत, परिष्कृत हो पाये? देर-सबेर रूक गए, सड़ गए, सूख गए। अभिमान ठूंठ की तरह अनुत्पादक बना देता है। समाज रूपी सागर से भरपूर मिलन की अभीप्सा में यात्र चले और निरंतर मिलन होता रहे।

पृष्ठ संख्या 71

इस सदी में समाजपोषक, समर्पणशील, अंहरहित, ध्येयनिष्ठ, अनुग्रहशील और कर्तव्य बोध प्रेरित सामाजिक सक्रियता की मिसालों के लिए यह भूमि और उस पर रहने वाला जन प्यासा है। यह प्यास मिटेगी तो सहज ही वर्तमान सामाजिक सक्रियता के दामन पर लगा दाग भी छूटेगा और मनुष्यता के अंधियारे दौर में उजियारा नई सुबह की तरह प्रकट होगी और तब ‘क्या फायदा होगा’ का सवाल पूछने वाले लोग सामाजिक सक्रियता से उपजते सुकून से स्वयं के जीवन को सहज और समर्थ बनाने के रास्ते पर चलने की तैयारी करने लगेंगे।

पृष्ठ संख्या 80

घरों की चारदीवारी के भीतर और बाहर महत्त्वाकांक्षाओं का जो क्रूर खेल चल रहा है, वह बचपन को छीन रहा है। सारी दुनियाँ में बच्चे लगभग ‘उपनिवेश’ की तरह जी रहे हैं। बड़ों ने उनकी सहजता, स्वतन्त्रता, संवेदनशीलता और सृजनशीलता को मानों छीन लिया है।

 पृष्ठ संख्या 85

वह जो छूटा है, पिछड़ा है वह साथ आए, जो साथ है उसके कदमों के साथ ताल मिले और जो आगे चल रहे हैं, उनके पंथान्वेषण के प्रति अनुग्रह उमगता रहे-यह ताकत राजनीति में सहज उपलब्ध होती है। स्वयं के योग्य, समर्थ, सजग, सशक्त, धैर्यवान, संयमी और विनयी होने के लिए राजनीति एक खुली प्रशिक्षणशाला है। यह मनुष्यता के उत्थान की चुनौती भरी राह है। सहज ही इस राह में बाधाएं भी है, पर बाधाएं तो मंज़िल के महत्त्व की सूचना देती है।

पृष्ठ संख्या 93

जनसक्रियता आने वाली सदी का सच है। पुरानी सदी गुलामी, पराधीनता और प्रभावकामिता में बीत गई। यह सदी सहज स्वातंत्रय की सदी है_ अभाव, दबाव, प्रभावों से मुक्त स्वभाव (होश) की सदी है। सदी के इस दूसरे दशक के प्रारंभ में जनसक्रियता सारी दुनियाँ में जोरों पर है_ मानो तंद्राग्रस्त मनुष्य करवट बदल रहा है। जागने की घड़ी करीब है। सदियों से पराधीन यह जन अब जागने वाला है।

पृष्ठ संख्या 98

झेन साधक मानते हैं, ‘दृष्टि ही मुक्ति है’। राजनीति को संसार की, अनुभव की, प्रयोग की, कर्म की, मुक्ति की रंगशाला की तरह देखना मुक्ति की राह पर कदम रखना है। विडंबना है कि अरसे से राजनीति की आध्यात्मिक उर्वरा संपन्न भूमि अनबोई, असिंचित है। यों कि जैसे इसे गलने को तत्पर बीजों की तलाश है। यों लगता है मानों यह जमीन बंजर हो चली है।    यहां कंकड़ों का ढेर लग गया है। गलने में अनुत्सुक, अनुद्यत बीज अकड़कर, जकड़कर कठोर कंकड बन गए हैं।    इस भूमि को नए, ताजा बीजों की तलाश है कि इस बार की बारिश में ये ताजे बीज स्वयं को गलाकर, मिटाकर प्रस्फुटित होने को तैयार हो जायें और इस जमीन की उर्वरता वापस लौट आये, इसका भाग्य इसको वापस मिल जाये। कंकड़ो से अटी पड़ी इस धरती पर हरहराती फसल उग आये। सृष्टि को क्षुधा-दग्ध अवस्था से मुक्ति मिले, अतृप्त पूरी आंख वाले, जागे हुए बुद्ध चेतना संपन्न पद्मवत्, ऋषिवत् राजनीतिज्ञों का उदय हो और इस उर्वरा भूमि के चरित्र पर उठे संदेहों का निवारण हो सके।

पृष्ठ संख्या 130

भरोसे के इन भ्रमों के पार सत्य, नितांत सहज, स्वाभाविक, अविश्वसनीय, अमूर्त और अकल्पनीय है, जो ‘होने का’ सार्वत्रिक, सार्वभौमिक आनंद बिखेरता है, तब गुस्सा और गुमान लगभग ऐसे ही खो जाते हैं जैसे भरी दुपहरी में परछाई खो जाती है। इस सभ्यता में ज़िन्दगी जी रहे हम सब ज़र्रों को सूरज होने की इस मंज़िल के लिए अनंत शुभकामनाएं।

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One Comment

  • Wow, what a beauty this book must be! Every word is profound…it evokes a desire in you to come to the field and seeks you to work gallantly. It pursues your heroic, yet polite spirit…what a good blend!

    क्या कहूं, एक एक शब्द झंझोड़ गया है मुझे, बार-बार इसे पढ़ रही हूँ, और प्रेरित हो रही हूँ

    इसे पढ़ कर लगता है, अभी आने वाला है नया-दौर !

    उच्चतम प्रकाश के धनी, सकारात्मकता के बीज बोने वाले लेखक को मेरा नमन…

    अनिल जी और प्रवासी दुनियां की पूरी ‘टीम’ को शुभ कर्म में जुटे रहने के लिए मेरा अभिवादन

    इन्द्रा धीर वडेरा

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