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कौन बड़ा है – नामवर सिंह


डॉ. नामवर सिंह की मौखिक व्यंग्य-प्रतिभा से मैं बहुत पहले से परिचित था और उनके वाग्वैदग्ध्य से चमत्कृत भी,  परंतु उनके व्यंग्य-लेखन से मैं परिचित नहीं था। यहां तक कि व्यंग्य पर शोध करते समय भी मेरी अनभिज्ञता बनी रही (क्योंकि मैं दिल्ली-विश्वविद्यालय का छात्रा था न कि जे.एन.यू. का)। नामवर जी के व्यंग्यात्मक लेखन की ताकत से परिचित करने का श्रेय आदरणीय श्रीलाल शुक्ल को जाता है। सन् 1994 की बात है जब मैं, भाई श्रीकृष्ण के आग्रह पर, बीसवीं-शताब्दी व्यंग्य-संकलन का संपादन-कार्य कर रहा था और उसी सिलसिले मैं मैंने श्रीलाल जी को, उनकी रचना संकलन में सम्मिलित करने के लिए पत्र लिखा था। उन दिनों श्रीलाल जी नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए ‘हिंदी हास्य व्यंग्य’ संकलन तैयार कर रहे थे। उन्होंने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि क्यों न मैं इस संकलन को तैयार करने में उनका सहयोग करूं । मेरे लिए यह ऐतिहासिक महत्व का प्रस्ताव था जिसे नकारना केवल मूर्खता और मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ न होता। श्रीलाल जी के साथ संकलन तैयार करते समय मुझे उनकी अध्ययनशीलता का लाभ तो मिला ही व्यंग्य के प्रति मेरी दृष्टि भी साफ हुई। इस सिलसिले में मुझे पता चला कि नामवर जी ने भी व्ंयग्य रचनाएं लिखी है जो ‘बकलम खुद’ में संकलित हैं। श्रीलाल जी से संकलन लेकर मैंने पढ़ डाला और प्रभावित भी हुआ। संकलन के लिए श्रीलाल जी को नामवर जी की रचना ‘बापू की विरासत’ पसंद थी और मुझे ‘कौन बड़ा है’। नेशनल बुक ट्रस्ट वाले संकलन के लिए ‘बापू की विरासत’ को ले लिया गया और मैंने अपने संकलन के लिए ‘कौन बड़ा है’ का चुनाव किया।

इस स्तम्भ के लिए नामवर जी की इस रचना का चुनाव संपादक की पसंद पर आधारित है न कि लेखक की पसंद के अधार पर। ( लेखक की क्या पसंद है, इसे रहस्य ही रहने दें। प्रस्तुत व्यंग्य रचना के पुर्नप्रकाशन की अनुमति के लिए नामवर जी ने अनुमति तो सहर्ष दे दी परंतु इस पर ‘फिलहाल टिप्पणी लिखना संभव नहीं है’, कहकर अपनी असमर्थता प्रकट की । इस व्यंग्य रचना के पुर्नप्रकाशन का उद्देश्य मात्र यह है कि नामवर जी की मौखिक व्यंग्य-प्रतिभा से परिचित प्रशंसक,  मेरी तरह अनभिज्ञ न रहें और उनकी लेखकीय व्यंग्यात्मक प्रतिभा से भी परिचित हों। नामवर जी की यह रचना साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति और उसके लिए चलाए जा रहे दुष्चका्रें पर व्यंग्यात्मक प्रहार करती है। सुविज्ञ पाठक चाहें तो इसमें अन्य अनेक विसंगतियां भी ढूंढ सकते हैं। शोध का अच्छा विषय है। – संपादक

कल जब मैं पुस्तकालय गया तो बड़ी चहल-पहल दिखाई पड़ी। बहुत-सी पुस्तकें अपनी-अपनी आलमारियों से निकलकर जोर-जोर से बातें कर रही थीं, वे चुप न बैठी थीं। पाठक सभी दर्शक की तरह देख रहे थे और पुस्तकें धूल-धक्कड़ झींगुर वगैरह से लिपटकर  शृंगार कर रही थीं। किसी की हिम्मत न थी जो उनसे कुछ पूछता। मैं साहस करके पुस्तकाध्यक्ष महोदय से पूछ बैठा। उन्होंने अत्यंत सनसनीदार सूचना दी। बोले, ‘अभी हाल ही में जब ‘साहित्य सम्मेलन’ में मंगलाप्रसाद पारितोषिक समिति की बैठक हुई तो एक सदस्य ने नया प्रस्ताव रखा कि इस वर्ष का पुरस्कार समूचे हिंदी साहित्य के सबसे बड़े साहित्यकार को दिया जाय। एक दूसरे सदस्य ने आपत्ति उठाई कि नियम के अनुसार तो यह केवल जीवित साहित्यकारों को ही दिया जा सकता है। प्रस्तावक महोदय ने कहा कि क्या साहित्यकार भी कभी मरता है, वह तो अमर होता है। बात वाजिब थी, व्याख्या नयी थी। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए प्रस्तावक महोदय ने कहा कि साहित्यकार तो शारीरिक रूप से मरने के बाद ही जीवित होता है। प्रमाणस्वरूप उन्होंने अपना ही उदाहरण दिया और कहा कि इस समय साहित्य में कोई उन्हें जीवित नहीं समझ रहा है। आगे उनका तर्क था कि नियम तो रूढ़ियों से ही बनते हैं। यदि हम लोग साहित्यकारों को अमर मानकर तुलसी, सूर, कबीर आदि को भी पुरस्कार देने की परम्परा चला देते हैं तो मरने के बाद स्वयं भी उसका पुरस्कार पावेंगे। इसके अतिरिक्त यदि कोई यह आपत्ति करता है कि क्या उन महाकवियों ने अपनी रचनाएं पुरस्कार के लिए भेजी थीं तो निःसंकोच ही कहा जा सकता है, क्योंकि सम्मेलन-पुस्तकालय में उन लोगों की पुस्तकें प्रकाशित रूप में ही नहीं, पाण्डुलिपि रूप में भी पड़ी हैं। जिन पुस्तकों की पाण्डुलिपि न हो, उनकी तैयार भी कराई जा सकती है।

प्रस्ताव इतना तर्क-सम्मत था कि सर्व-सम्मति से स्वीकृत हुआ, यद्यपि सम्मेलन के इतिहास में सर्व-सम्मति से होने वाला यह पहला प्रस्ताव था। अब समस्या थी कि यह कैसे देखा जाएगा कि कौन साहित्यकार सबसे बड़ा है। इस बार भी प्रस्तावक महोदय ही बोले कि इन सभी साहित्यकारों को पूरी तैयारी के साथ सम्मेलन-भवन में बुला लिया जाय और एक-एक कर सबकी उंचाई नाप ली जाए क्योंकि उनकी पुस्तकों को पढ़कर निर्णय करने में तो सालों लग जाएंगे।

सभी सदस्य मारे खुशी के उछल पड़े। इस पर एक सदस्य ने कहा, ‘इतनी बुद्धिमता से भरे प्रस्ताव पर स्वयं आप ही मंगला प्रसाद पारितोषिक के अधिकारी हो जाते हैं। अस्तु, मैं प्रस्ताव करता हूं अगले वर्ष का पुरस्कार आप ही को क्यों न दिया जाय?’

इस पर प्रस्तावक महोदय ने चट से कहा, ‘आपकी इस गुण-ग्राहकता और खरी सूझ को देखकर मैं प्रस्ताव करता हूं कि मेरे बाद वाले वर्ष का पारितोषिक आप ही को दिया जाय। यही नहीं, इतने महत्वपूर्ण प्रस्ताव जिस उपसमिति में स्वीकृत हो रहे हैं उसके प्रत्येक सदस्य को एक-एक कर आगामी वर्षों में पुरस्कृत कर देना चाहिए। यह तय नहीं कि आने वाले सदस्य इस बात से सहमत नहीं हों, अस्तु इस तरह का एक उपनियम बनाकर विधान में जोड़ दिया जाय।’ ‘अहां रूपं अहो ध्वनि’ से भवन गूंज उठा।

लोग इतने प्रसन्न हुए कि प्रस्तावक महोदय को दुबारा पारितोषिक देने का प्रस्ताव आते-आते बचा। अंत में उस टूर्नामेंट के लिए तिथि निश्चित करके बैठक ने विराम लिया।

इतना कह चुकने के बाद पुस्तकाध्यक्ष महोदय ने कहा कि आज उसी सूचना का प्रभाव है जो पुस्तकें ‘साहित्य सम्मेलन भवन’ में जाने की तैयारी कर रही हैं। विद्यापति से प्रेमचंद और प्रसाद तक के साहित्यकारों की होड़ है अत एव इन सभी साहित्यकारों की पुस्तकें भी तमाशा देखने जा रही हैं क्योंकि इस विजय का प्रभाव उनके भावी जीवन पर पड़ सकता है। यों इन पुस्तकों में बहस वगैरह तो अभी से शुरू हो गई है।

इतना सुना तो स्वयं भी घटनास्थल पर पहुंचने का लोभ संवरण न कर सका। स्टेशन की ओर झपटा हुआ जा रहा था कि ‘हिंदी पुस्तक एजेंसी’ पर बड़ी भीड़ देखी। पूछने पर मालूम हुआ कि शायद वेश बदलकर साहित्यकार लोग ही अपनी पुसतकें खरीदने आए हैं। परंतु कुछ संत और भक्त कवि वहां नहीं दिखाई पड़े। दुकानदार ने कहा कि वे अपरिग्रही महात्मा लोग पैसा कहां से पाएं, अतः किसी पुस्तकालय की शरण गए होंगे। इच्छा तो हुई लपककर ‘कारमाइकेल’ पुस्तकालय में देख लूं परंतु गाड़ी का समय हो गया था।

काशी से प्रयाग जाने वाली यह आखिरी गाड़ी थी,  इसलिए सबसे अधिक भीड़ इसी में थी। गाड़ी में आदमियों से ज्यादा पुस्तकें ही थीं और स्टेशन मास्टर का कहना था कि यदि यही मालूम होता तो यात्री गाड़ी की जगह मालगाड़ी का ही प्रबंध किया गया होता।

रास्तेभर गाड़ी में पुस्तकों ने क्या-क्या काण्ड किए, इसका बयान न करना ही अच्छा है। रीतिकालीन पुस्तकें तो रातभर जागकर अन्त्याक्षरी करती गईं। आधुनिक युग की किताबों ने कवि-सम्मेलन का आयोजन कर लिया था। हां, बीच-बीच में यदि चुप दिखाई दे रही थीं तो भक्तियुग की पोथियां। यह अकाण्ड काण्ड देखकर मानस, बीजक और सूरसागर वगैरह आंख मूंदकर रातभर माला जपते रहे अथवा ध्यानमग्न थे।यह अवश्य था कि रीतिकालीन पुस्तकें इस ध्यानलीन ग्रंथों पर कभी-कभी व्यंग्यात्मक समस्या पूर्तियां भी कर देती थीं। परंतु उसका कोई उत्तर नहीं दिया गया। यात्रा सकुशल समाप्त हुई।

उतरकर नियत समय से कुछ पहले ही सम्मेलन-भवन पहुंचा। पहुंचते ही देखा कि प्रकाशक लोग पहले से ही डटे हैं, क्योंकि यह उनके हानि-लाभ का ही नहीं, जीवन-मरण का प्रश्न था। थोड़ी देर बाद समालोचकों का दल भी आ धमका। इनमें कुछ लोगों ने कहा कि हम लोग दर्शकों के स्थान पर न जाकर सीधे अखाड़े में ही दाखिल हो जाएं। परंतु आचार्य शुक्ल जैसे गंभीर समालोचकों ने चुपचाप दर्शक मण्डली में ही स्थान लिया। देखा-देखी कुछ और लोग भी बैठ गए परंतु मिश्रबंधु, पद्मसिंह शर्मा, लाला भगवानदीन जैसे अखाड़िया दिग्गज विद्वान अखाड़े में ही बैठे। सभी लोग तो अब तक आ गए थे परंतु जिनमें होड़ थी अर्थात जिन साहित्यकारों के भाग्य का निर्णय होने वाला था उनमें से किसी का पता न था। निर्णायक मण्डल भी बैठ गया। फीता लेकर नापने वाले महानुभाव बेचैन से नजर आ रहे थे। नियत समय निकट आ रहा था परंतु प्रतिद्वन्द्वी साहित्यकारों में से कोई भी नहीं पहुंचा। कानाफूसी होने लगी। कोई कहता, सूचना नहीं पहुंची होगी। कोई कहता, सवारी नहीं मिली होगी। कोई कहता, गाड़ी लेट हो गई। परंतु कुछ लोगों का यह भी कहना था कि शायद अपना अपमान समझकर वे लोग न आए हों। मेरी बगल में कोई एकाक्ष पुरुष बैठे थे। उन्होंने कहा, ‘क्या देखते हो? सभी साहित्यकार वेश बदलकर बैठे हैं। घंटा बजते ही असली रूप में दाखिल हो जाएंगे।’

मुझे विश्वास नहीं हुआ। ठीक समय पर घंटा बजा। अंतिम झनक मौन भी न हो पाई थी कि शर्मा जी ने अपने पॉकेट से बिहारी को निकालकर रख दिया। देखना था कि मिश्रबंधुओं ने देव को अपने झोले से निकालकर खड़ा कर दिया था। निर्णायक मण्डल देख रहा था कि केवल दो ही पहलवान मैदान में आए और बाकी किसी का पता नहीं। निर्णायकों को चुप देखकर शर्माजी तथा मिश्रबंधु एक साथ बोल उठे, ‘जब समय हो गया है तो काम शुरू हो जाना चाहिए, कोई आए, चाहे नहीं।’

निर्णायक मण्डल मुंह छिपाने लगा। अंत में दृढ़ होकर सभापति ने कहा, ‘भक्तप्रवर सूर, संत कबीर और महात्मा तुलसीदास आदि प्राचीन तथा भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद आदि अनेक नवीन महान साहित्यकारों में कोई नहीं आया है। अस्तु कार्यवाही उनके आने पर ही शुरू होगी क्योंकि यह हिंदी सम्मान का प्रश्न है।’

सभापति महोदय शायद कुछ और कहने वाले थे परंतु बीच ही में किसी ने टोककर कहा, ‘क्या प्रसाद जी को भी यहां बुलाया गया है? उन्हें तो एक बार मंगला प्रसाद पारितोषिक मिल चुका है।’

शर्मा जी वगैरह ने कहा, ‘यह प्रतियोगिता तो केवल प्राचीनों की ही है। नवीनों को इनमें नहीं बुलाना चाहिए था।’

और लोगों ने कुछ-न-कुछ कहा परंतु उस कौवा-रोर में कुछ सुनाई न पड़ा। यह देखकर आचार्य द्विवेदी और आचार्य शुक्ल उठकर जाने लगे। प्रबंधकों ने दौड़कर उन्हें बिठाने का अनुरोध किया। द्विवेदीजी तो नहीं माने-चले गए, परंतु शुक्ल शीलवश रुक गए। जब अधिक समय हो गया तो शर्माजी वगैरह ने फिर आपत्तियां उठाईं। इस बार प्रकाशकों के दल में कुछ सुगबगाहट शुरू हुई और देखते-देखते गीता प्रेस ने गोस्वामी तुलसीदास को, ब्रजमण्डल ने सूरदास को तथा इसी प्रकार सरस्वती बुक डिपो ने प्रेमचंद और ना॰प्र॰ सभा ने भारतेन्दु को अपने-अपने पॉकेट से निकालकर रख दिया। शेष सभी लोगों को एक साथ भारती भण्डार ने उपस्थित कर दिया। किताब महल ने भी एक अध्ययन सीरीज की पुस्तकों का टाल लगा दिया।

अब सरगर्मी आ गई। इसी तरह सभी

लोगों ने अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वियों को मैदान में एक कतार में खड़ा कर दिया। दर्शक देख रहे थे कि अनेक महाकवि छोटे पड़ रहे हैं। निर्णयक मण्डल ने आज्ञा दी-‘जो चाहे अपने साहित्यकार को उंचा दिखाने के लिए पांच मिनट तक अनेक सहायक साधनों का उपयोग कर सकता है।’

आलोचकों और प्रकाशकों ने काम शुरू किया। तुलसी को उंची एड़ी की खड़ाउं पहनाई गई, तो कबीर के सिर पर लंबी टोपी रखी गई, बिहारी को पगड़ी बांधी गई तो देव को भी उचकने के लिए सिखाया गया। गरज कि सबको अलग-अलग असली कद से कुछ-न-कुछ उंचा दिखाया गया। अब संरक्षकों को अलग कर दिया। ज्यों ही नाप शुरू होने वाली थी, एक प्रकाशक ने पूछा, ‘क्या इन महाकवियों को उंचा सिद्ध करने के लिए उनकी लिखी पुस्तकों तथा उनके संबद्ध आलोचना ग्रंथों का उपयोग नहीं किया जा सकता?’

देव के समर्थकों ने सबसे पहले हल्ला मचाया- ‘जरूर, जरूर।’

निर्णायक मण्डल ने विवश होकर यह भी सुविधा दे दी। देखते-देखते मिनट भर के भीतर न जाने कितने रिसर्च स्कॉलर तैयार किए गए और उन्हें अग्रिम डॉक्टरेट भी दे दी गई। इस तरह बहुत से महाकवियों के पैरों तले तो केवल सादे पत्रों का ही सजिल्द पुलिन्दा यह कहकर रखा गया कि यह अप्रकाशित थीसिस है। किसी की हिम्मत न थी जो उसका विरोध करता। कुछ लोगों को इस पर भी संतोष न हुआ। अतः एक समीक्षक महोदय ने, जो सबसे लंबे थे, प्रस्ताव किया कि क्या अपने-अपने प्रतियोगियों को उंचा दिखाने के लिए हम लोग अपने कंधों का सहारा नहीं दे सकते?

पहले कुछ विरोध हुआ, अंत में डंके की चोट निर्णायक मण्डल ने यह निवेदन भी स्वीकार कर लिया। इस सुविधा के मिलते ही चारों ओर तहलका मच गया। पता न चला कि कौन दर्शक है और कौन प्रतियोगी। फलतः दर्शक कोई न रहा। पहले पुस्तकें रखी गईं। उन पर खड़े हुए प्रकाशक, प्रकाशकों के उपर आलोचक और आलोचकों के उपर रखा गया स्वयं कवि को परंतु यह निर्णय इतना जल्दी नहीं हुआ। एक कवि के अनेक आलोचकों में इसके लिए भी बहुत हुज्जत हुई कि किसके उपर कौन रहेगा। अंत में यह रास्ता निकाला गया कि उपर-नीचे रखने में तिथि-क्रम का आश्रय लिया जाय।

बाज-बाज आलोचक एक ही समय अनेक कवियों के आलोचक थे। अतः प्रकाशकों ने उन्हें बाध्य किया कि वे उन सभी कवियों को अपने उपर लादें। ऐसे आलोचकों का कचूमर निकल गया। एक अध्ययन वाले एक नवीन आलोचक को सबसे अधिक भार वहन करना पड़ा।

इसी बीच कुछ कवियों को फिर भी छोटा पड़ता देखकर स्वयं निर्णायकों में कानाफूसी होने लगी। धीरे-धीरे कानाफूसी बहस की उंचाइयों तक पहुंच गई। प्रतियोगियों ने यह दशा देखकर निर्णायकों को भी अपनी-अपनी ओर खींचना शुरू किया। खींचतान इतनी हुई कि निर्णायकों में से किसी के तीन या चार टुकड़े हो गए। उस नापने वाले आदमी के तो सैकड़ों टुकड़े हो गए। फिर भी लोगों ने सबको अपने-अपने स्तंभों के नीचे रखा।

इस तरह जब पूरा स्तंभ तैयार हो गया तो कोई देखनेवाला न रहा कि आखिर सबसे बड़ा कौन है क्योंकि उन्हें आपस में लड़ते देखकर शुक्लजी वगैरह पहले ही चले गए। अब हर स्तम्भ अपने प्रतियोगी को बड़ा कहने लगा। नौबत हाथापाई की आ गई। लोगों ने अपने-अपने शीर्षस्थ कवियों से पूछा कि बोलो, कौन बड़ा है। परंतु बार-बार पूछने पर भी कोई आवाज न आई। चिढ़कर स्तंभ में खड़े आलोचकों ने कहा कि अगर नहीं बोलते तो तुम्हीं नीचे आ जाओ और हम स्वयं उपर जाकर बताएंगे कि कौन बड़ा है?

कहते-कहते स्तम्भ के आलोचकों ने कवियों को पटक-पटककर स्वयं ही उन पर चढ़ना शुरू किया। अब प्रश्न यह नहीं रहा कि कौन कवि बड़ा है, प्रश्न यह हो गया कि कौन आलोचक बड़ा है? अब कोई आलोचक किसी को कंधा देने के लिए तैयार न हो, यहां तक कि नए-नए डॉक्टरों ने भी अपने गुरुओं को शीश पर रखने से इंकार कर दिया। फिर क्या था? जबर्दस्ती होने लगी। कोई उछलकर किसी के सिर चढ़ जाता और कोई किसी के सिर। अंत में फैसला न होते देख सभी लोग पारितोषिक के रुपयों की ओर दौड़े परंतु वहां पहुंचकर देखा गया कि उसे तो लेकर पहले ही कोई भाग गया था।

आलोचक-समुदाय अवाक् खड़ा-खड़ा रहा था कि ‘माया मिली, न राम।’ उधर हमारे कवि धूल में तड़प रहे हैं। परंतु उनकी पिकर किसको? धरती रौंदी जाकर काफी धंस गई थी चारों ओर गर्द छा गई थी। उत्सुकतावश जनता की अपार भीड़ उमड़ी चली आ रही थी। कवियों की यह दशा देखकर उसने अपने हृदय की बाहें बढ़ाकर महाकवियों को उठाना शुरू किया। सबकी जबान पर केवल यही वाक्य था, तुम हमारे कवि हो, यही क्या कम है। कौन बड़ा है, हमें इससे मतलब नहीं।

आलोचक समुदाय भौंचक खड़ा देख रहा था। एक ने कहा, ‘यही तो हम भी कहते थे।’

उसके बाद क्या हुआ यह तो मालूम नहीं परंतु अब जब कोई आलोचक किसी कवि पर कलम उठाता है तो सुनते हैं, वह कवि दहल जाता है और आवाज आती है, हमें अनालोचित ही रहने दो।

जब मैंने सम्मेलन का यह काण्ड अपने एक प्रगतिशील समालोचक मित्र को सुनाया तो वह बोले, ‘अवश्य ही यह भारी गलती है। यही तो प्रतिगामियों का स्वभाव है। कवियों की जांच उंचाई के अनुसार नहीं बल्कि चाल के अनुसार होनी चाहिए। अर्थात् मुख्य प्रश्न यह है कि कौन कवि सबसे तेज चलता है।’

मैंने कहा, ‘जरूर-जरूर! वह तो होगा ही। होना ही चाहिए। और इसकी जांच के लिए हम लोग अभी से कवियों को दौड़ाने का अभ्यास करा रहे हैं।’

मैंने पूछा- ‘परंतु कहीं ऐसा न हो कि कवि लोग इतना आगे दौड़ जाएं कि उनके साथ चलने वाला आलोचक पिछड़ जाय और निर्णय ही न हो पाए।’

वे बोले, ‘ऐसे कैसे संभव है? साथ-साथ चलने वाला आलोचक यान में रहेगा। फिर मंजिले मकसूद पर यह सब देखने के लिए मार्क्स दादा तो खड़े ही हैं।’

बहुत दिनों के बाद सुना कि उस दौड़ के अभ्यास में मेरे वे प्रगतिशील आलोचक मित्र एक दिन मुंह के बल गिरे, फिर भी उत्साह ठंडा नहीं हुआ है। परंतु तब से कवियों पर मातम छा गया कि इस बार न जाने क्या होगा और जनता अपनी फसल की ओर देख रही है कि न जाने दौड़ किस जगह होगी?

 सौजन्य – व्यंग्यकार – संपादक  प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक’ मेरी श्रेष्ठ  व्यंग्य रचनाएं’

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